विनाशलीला के छठे दौर की तरफ दुनिया बढ़ चुकी है। हर चार में से एक प्रजाति पर विलुप्ति की तलवार लटकने लगी है। दुनिया से जैव विविधता खत्म होगी तो इंसानी जीवन भी अप्रभावित नहीं रहेगा। हम अपने विनाश की ओर बढ़ चले हैं। यह निष्कर्ष है दुनिया में जैव विविधता को लेकर किए गए अब तक के सबसे बड़े अध्ययन का। सोमवार को प्रकाशित इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बॉयोडाइवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (आइपीबीईएस) की इस रिपोर्ट का संयुक्त राष्ट्र ने भी समर्थन किया है। दुनिया भर के पचास देशों के पांच सौ विशेषज्ञ इसमें शामिल रहे।

खत्म हो रही विविधता
अध्ययन के अनुसार प्रत्येक चार में से एक प्रजाति पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। स्थलीय और जलीय जीव भी इसकी चपेट में हैं। पादप प्रजातियां भी इस संकट से गुजर रही हैं। जो प्रजातियां जल और थल दोनों पर रहती हैं, उनको सर्वाधिक खतरा है। वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि दुनिया जीवों के विनाश की घटना की तरफ बढ़ रही है। 50 करोड़ साल में यह ऐसा छठा घटनाक्रम होगा। पूर्व की तुलना में मौजूदा विनाशलीला की दर हजार गुना तेज है।

चौथाई जमीन मानव से दूर
आइपीबीईएस के अध्ययन के अनुसार धरती का एक चौथाई हिस्सा ही ऐसा है जो इंसानी गतिविधियों के असर से अभी अछूता है। हालांकि इसको लेकर भी चिंता बढ़ रही है। 2050 तक ऐसी जमीन की हिस्सेदारी सिर्फ दसवें हिस्से तक सिमट जाएगी।

परागण की बड़ी समस्या
दुनिया की 75 फीसद खाद्य पदार्थों से जुड़ी फसलें परागण के लिए जीवों पर आश्रित हैं। ऐसे में परागण कीटों के नुकसान से सालाना वैश्विक फसलों के 235-577 अरब डॉलर का आउटपुट खतरे में है। दुनिया की खाद्य सुरक्षा हिचकोले लेते दिख रही है।

जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन
अध्ययन की रिपोर्ट में चेताया गया है कि जब तक आप जैव विविधता नहीं बचाएंगे तब तक जलवायु परिवर्तन का सिलसिला नहीं रुकेगा और जब जलवायु परिवर्तन को रोका जाएगा तभी जैव विविधता रहेगी और तभी दुनिया का हर जीव सुरक्षित रहेगा।

जमीन की खराब गुणवत्ता
इंसानी गतिविधियां नकारात्मक रूप से 3.2 अरब लोगों का कल्याण प्रभावित कर रही हैं। गैर टिकाऊ कृषि और वानिकी, जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण इसकी बड़ी वजहें हैं। 2018 में दुनिया के उष्ण कटिबंधीय इलाकों में करीब 1.20 करोड़ हेक्टेयर वन खत्म हो गए।

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