अमर्यादित आचरण के आरोपों के मामले में प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) रंजन गोगोई को सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच कमेटी से क्लीनचिट मिल गई है। कमेटी ने महिला की शिकायत खारिज कर दी है। अपनी रिपोर्ट में कमेटी ने कहा है कि महिला की शिकायत में कोई ठोस तत्व नहीं मिला है।

सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल की ओर से वेबसाइट पर जारी नोट में इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के 2003 के पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि आंतरिक जांच कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाएगी।

यह है मामला
सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी ने 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के 22 न्यायाधीशों को हलफनामा भेजकर प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई पर अमर्यादित आचरण के आरोप लगाए थे। महिला का आरोप था कि जब वह प्रधान न्यायाधीश के आवास स्थित दफ्तर में तैनात थी, उस दौरान प्रधान न्यायाधीश ने उसके साथ अमर्यादित व्यवहार किया था। महिला ने अपनी शिकायत में दो घटनाओं का जिक्र किया था। आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के फुल कोर्ट (सभी न्यायाधीशों की बैठक) में प्रस्ताव पारित कर आंतरिक जांच कमेटी गठित की गई थी।

कमेटी के बारे में
कमेटी का मुखिया प्रधान न्यायाधीश के बाद दूसरे नंबर के वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे को बनाया गया था और दो महिला न्यायाधीश जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस इंदू मल्होत्रा इसकी सदस्य थीं। पहले कमेटी में जस्टिस एनवी रमना शामिल थे जो सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों में वरिष्ठता में तीसरे नंबर पर आते हैं। लेकिन शिकायतकर्ता महिला की ओर से जस्टिस रमना को शामिल किए जाने पर आपत्ति जताने के बाद उन्होंने स्वयं को कमेटी से अलग कर लिया था। इसके बाद जस्टिस इंदू मल्होत्रा कमेटी में शामिल हुईं थीं।

कमेटी ने जस्टिस अरुण मिश्रा को सौंपी रिपोर्ट
माना जा रहा है कि कमेटी ने अपनी रिपोर्ट जस्टिस अरुण मिश्रा को सौंपी है जो कि सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों के वरिष्ठताक्रम में चौथे नंबर पर आते हैं। इसका कारण यह है कि आरोप स्वयं प्रधान न्यायाधीश पर लगे हैं। दूसरे नंबर के वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे आंतरिक जांच कमेटी के मुखिया थे। तीसरे नंबर के वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना ने स्वयं को कमेटी से अलग कर लिया था। इसलिए रिपोर्ट चौथे नंबर के वरिष्ठ न्यायाधीश को सौंपी गई है। रिपोर्ट की एक प्रति संबंधित न्यायाधीश यानी प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को भी दी गई है।

शिकायतकर्ता के भाग नहीं लेने पर की एकतरफा सुनवाई
शिकायतकर्ता महिला ने जांच कमेटी की तीन कार्यवाहियों में हिस्सा लेने के बाद 30 अप्रैल को प्रेस रिलीज जारी कर कमेटी की कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए उसमें भाग लेने से इन्कार कर दिया था। महिला ने कहा था कि उसे वकील या सहयोगी को साथ रखने की इजाजत नहीं दी जा रही है। न ही कमेटी ने उसके बयान की प्रति उसे मुहैया कराई है। कमेटी की कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकार्डिग भी नहीं हो रही है।

महिला का कहना था कि कमेटी उसकी मांग नही मान रही है ऐसे में उसे कमेटी से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है। कमेटी ने महिला को पहले ही बता दिया था कि अगर वह भाग नहीं लेगी तो कमेटी एकतरफा सुनवाई करेगी। लिहाजा इसके बाद कमेटी ने एकतरफा सुनवाई जारी रखने का फैसला लिया था।

सीजेआइ भी कमेटी में हुए थे पेश
कमेटी ने प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को कमेटी से मिलने के लिए लैटर ऑफ रिक्वेस्ट जारी किया था। जिस पर प्रधान न्यायाधीश कमेटी में पेश हुए थे और उन्होंने कमेटी के सवालों का जवाब भी दिया था।

सीजेआइ के खिलाफ आरोपों का यह मामला कुछ न्यूज वेबपोर्टलों की रिपोर्टो से 20 अप्रैल को सार्वजनिक हुआ था। आरोप सार्वजनिक होने के कुछ ही घंटे बाद सीजेआइ ने शनिवार, 20 अप्रैल को जस्टिस अरुण मिश्रा और संजीव खन्ना के साथ एक अभूतपूर्व सुनवाई की थी।

हालांकि सीजेआइ ने सुनवाई के बीच में खुद को पीठ से अलग कर लिया था, लेकिन उससे पहले उन्होंने आरोपों को ‘अविश्वसनीय’ करार देते हुए कहा था कि इसके पीछे एक बड़ी साजिश है और वह आरोपों का खंडन करने के लिए भी उतने नीचे तक नहीं जा सकते।

(Adapted from jagran.com)