भारत ने जब भी चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोट इनिशिएटिव यानी बीआरआइ पर कोई रुख अख्तियार किया है तो ऐसा करके उसने उसे और साथ ही दुनिया को कई संदेश देने का काम किया है। चीन एक बार फिर बीआरआइ से जुड़ा आधिकारिक आयोजन करने जा रहा है। इसमें शामिल होने के लिए उसने भारत को भी निमंत्रण दिया था। पहले की तरह इस बार भी भारत ने इस न्यौते को ठुकरा दिया। इससे पहले भी भारत ने चीन के इस आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था। नई दिल्ली ने मई 2017 में प्रथम बेल्ट एंड रोड फोरम (बीआरएफ) सम्मेलन का भी बहिष्कार किया था जिसमें 129 देशों और कई राष्ट्राध्यक्षों ने भाग लिया था। भले ही अमेरिका, रूस, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने उसमें भाग लिया हो, लेकिन भारत इसे लेकर अपने रुख पर मजबूती से टिका हुआ है। वह इस चीनी पहल पर अपनी आपत्तियों को जाहिर करता रहा है।

बीआरआइ के माध्यम से खुद को वैश्विक शक्ति के तौर पर पेश करने की चीनी आकांक्षाओं के लिए भारत का यह रुख एक बड़ा झटका था। भारत के इन्कार के बाद से चीन को ऐसे कई झटके लगे हैं जिन्होंने उसके लिए समस्याएं कई गुना बढ़ा दी हैं। चूंकि भारत ने एक बार फिर अपना विरोध जताया है तो बीजिंग भी इस पर अपने पत्ते फेंटेगा। इसके संकेत भी मिल गए हैं। चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने इसका उल्लेख कुछ इस तरह किया है, ‘अगर भारत बीआरआइ के तहत सहयोग से मुंह फेरता है या फिर कुछ परियोजनाओं में हस्तक्षेप करता है तो वह कई बड़ी विकास परियोजनाओं से जुड़ने का अवसर खो बैठेगा। साथ ही कई दक्षिण एशियाई देशों के साथ बेहतर जुड़ाव की उसकी योजनाओं को भी नुकसान होगा।’

नई दिल्ली का हालिया निर्णय चीन के उस रुख के बाद सामने आया है जिसमें चीन मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने की भारत की कोशिशों को लगातार झटका देता आया है। हाल के पुलवामा आतंकी हमले के बाद भी चीन का रुख इस मसले पर बदला नहीं। अगर वुहान वार्ता को छोड़ दिया जाए तो भारत-चीन रिश्तों के मोर्चे पर कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। कुछ हालिया रपटों में यह सामने आया है कि डोकलाम पठार पर चीन अपनी स्थिति लगातार मजबूत बना रहा है। यह सीमा पर चुनौती को दर्शाता है। जो भी हो, भारत की संप्रभुता का मूल प्रश्न बीआरआइ को लगातार परेशान करता रहेगा। जैसा कि चीन में भारत के राजदूत विक्रम मिस्नी ने दोहराया, ‘कोई भी देश ऐसी परियोजना से नहीं जुड़ सकता जो संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर उसकी मुख्य चिंताओं की अनदेखी करती हो।’

हालांकि बीआरआइ को लेकर बाकी दुनिया को लुभाने की चीनी मुहिम लगातार जारी है, लेकिन भारत अपने रवैये पर कायम है और उसे कायम रहना भी चाहिए। बीआरआइ से जुड़े कार्यक्रम में करीब सौ से अधिक देश हिस्सा लेंगे। इस आयोजन में लगभग 40 देशों के राष्ट्रप्रमुखों के भी शामिल होने की उम्मीद है। पश्चिमी देशों में बीआरआइ को लेकर कुछ संशय और संदेह के बावजूद अभी हाल में इटली इस परियोजना के साथ जुड़ा है। चीन ने दुनिया को यह समझाने में कामयाबी हासिल की है कि आर्थिक भूमंडलीकरण के अगले चरण के लिए बुनियादी ढांचा विकास और कनेक्टिविटी की तत्काल सख्त जरूरत है। अन्य प्रमुख शक्तियों को भी इस बात के लिए बाध्य किया गया है कि अपनी इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी योजनाओं के लिए वे चीन की शरण में आएं।

दुनिया भर में इस मोर्चे पर बहुत बड़ी मांग पैदा हो गई है और चीन इस मांग को पूरा करने की कोशिश में समर्थ दिखने वाले प्रमुख देश के रूप में उभरा है। बहरहाल इस राह में आने वाली बाधाओं से पार पाने में बीजिंग को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। उसमें उसका रवैया और छवि भी आड़े आ रही है। भारत अपनी संप्रभुता के आधार पर चीन की बीआरआइ परियोजना का विरोध तो कर ही रहा है, इसके साथ ही वह परियोजना को लेकर वित्तीय और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे भी उठा रहा है। ये मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। कई ऐसे देश जो शुरुआत में बड़े उत्साह के साथ बीआरआइ परियोजना के साथ जुड़े उनमें से कुछ का रुख-रवैया अब बदला हुआ है और वे भारत के सुर में सुर मिला रहे हैं।

दक्षिण पूर्व एशियाई देशों ने हाल में चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर कर्ज के जाल में फंसने की आशंका जताई। मालदीव और श्रीलंका से लेकर मलेशिया और थाईलैंड तक तमाम देशों में चीन की कई परियोजनाओं के भविष्य को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि चीन की आर्थिक उद्दंडता पर पश्चिमी जगत भी सख्ती कर ही रहा है। जर्मन उद्योग परिसंघ ने हाल में यूरोपीय संघ से कहा है कि चीन के साथ वह सख्त शर्तों पर समझौता करे जो बाजार में उत्पाद डंप करके, आक्रामक तकनीक और वित्तीय बैंकिंग में असमानता जैसे संदिग्ध तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है।

बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी को लेकर भारत ने कई तरह से वैश्विक विमर्श को दिशा दी है। इसमें चीनी बीआरआइ के शोषणकारी स्वरूप को भी उकेरा है। अपनी संप्रभुता के मुद्दे पर बीआरआइ के विरोध से परे भी भारत इस मुद्दे पर सकारात्मक विमर्श पेश करने में सफल रहा है। इस कवायद में भारत को खुद अपनी क्षमताओं से साक्षात्कार करना पड़ा है कि वह स्वयं कैसे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मोर्चे पर योगदान दे सकता है। अन्य देशों के साथ साझेदारी को लेकर मौलिक चिंतन के साथ ही उसे स्वयं अपना प्रदर्शन सुधारने पर मजबूर होना पड़ा है।

बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी को लेकर भारतीय दृष्टिकोण में नए किस्म की वह गंभीरता देखने को मिली जिसका पहले अभाव नजर आता था। बीआरआइ के विरोध के साथ ही भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की संयुक्त परियोजनाओं से भी समान दूरी बनाकर इस मोर्चे पर संतुलन बिठाया है। इसके बजाय भारत द्विपक्षीय साझेदारियों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसके लिए दक्षिण एशिया में वह जापान के साथ काम कर रहा है। भारत एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं वाले मॉडल को तरजीह दे रहा है।

बीआआइ को लेकर शुरुआती विरोध के बावजूद भारत इससे जुड़े मुद्दों पर वैश्विक विमर्श को दिशा दे रहा है। भविष्य में यह भारतीय नीति निर्माताओं पर निर्भर करेगा कि वे चीनी परियोजनाओं पर उठते संदेह के बादलों के चलते बनने वाले अवसरों को किस तरह भुनाते हैं ताकि भारत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की सुविधा उपलब्ध कराने वाले बड़े खिलाड़ी के रूप में उभर सके।

(Adapted from Jagran.com)