ओडिशा समेत देश के चार राज्यों में दो दिन तक चक्रवाती तूफान फैनी का असर रहेगा। इससे पहले बंगाल की खाड़ी में 2014 में हुदहुद, 2017 में ओकी, फिर तितली और 2018 में गजा तूफान आए। फैनी के बाद अगला चक्रवाती तूफान जब भी आएगा उसका नाम वायु होगा। आमतौर पर यह जिज्ञासा रहती है कि इन तूफानों के नाम कैसे और किस आधार पर रखे जाते हैं। विश्व में अब जितने तूफान आते हैं उन सभी को एक नाम दिया जाता है।

2004 से शुरू हुआ नाम देने का सिलसिला
अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में आने वाले समुद्री तूफानों के नाम रखने का सिलसिला 15 साल पहले यानी 2004 में शुरू हुआ। इसके लिए एक सूची बनाई गई। इस सूची में आठ देश शामिल हैं। आठ देशों को क्रमानुसार आठ नाम देने हैं। जब जिस देश का नंबर आता है तो उस देश की सूची में दिए गए नाम के आधार पर उस तूफान का नामकरण कर दिया जाता है। फैनी नाम बांग्लादेश ने दिया है। 

8 देशों ने 64 नाम दिए
तूफानों के नाम आठ देशाें ने दिए हैं। इनमें बांग्लादेश, भारत, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड शामिल हैं। हर देश ने आठ नाम दिए हैं। इस तरह कुल 64 नाम तय किए गए हैं।

सबसे पहले ‘ओनिल’
2004 में जब तूफानों को नाम देने की परंपरा शुरू हुई तो पहले अंग्रेजी वर्णमाला के हिसाब से बांग्लादेश को ये मौका मिला। उसने पहले तूफान को ओनिल नाम दिया। इसके बाद जो भी तूफान आए, उनके नाम निर्धारित क्रमानुसार तय किए गए। क्रम निर्धारण 8×8 की एक टेबल से किया जाता है। जब ये नाम क्रमानुसार समाप्त हो जाएंगे तो फिर एकबार इन्हें ऊपर से शुरू किया जाएगा। अब तक इस टेबल की सात पंक्तियां पूर्ण हो चुकी हैं। फैनी आठवें कॉलम का पहला नाम है। इसके बाद भारत की तरफ से नाम दिया जाएगा। ये होगा वायु। इस लिस्ट में आखिरी नाम होगा अम्फान और ये थाईलैंड का दिया हुआ है।

नामकरण इसलिए ताकि पहचान और सतर्कता रहे
एक सवाल लाजिमी है कि तूफानों को आखिर नाम देने की जरूरत क्या है? दरअसल, इसकी कुछ वजहें मानी जाती है। जैसे, इससे मीडिया को रिपोर्ट करने में आसानी होती है। नाम की वजह से लोग चेतावनी को ज्यादा गंभीरता से लेते हैं और आपदा से निपटने की तैयारी में भी मदद मिलती है। आम जनता भी ये नाम संबंधित विभागों के जरिए सुझा सकती है। इसके लिए नियम हैं। दो शर्तें प्राथमिक हैं। पहली- नाम छोटा और सरल हो। दूसरी- जब इनका प्रचार किया जाए तो लोग समझ सकें। एक सुझाव ये भी दिया जाता है कि सांस्कृतिक रूप से नाम संवेदनशील न हों और न ही उनका अर्थ भड़काऊ हो।

(Adapted from Bhaskar.com)