अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए 2020 में होने जा रहे चुनावों को लेकर सबने कमर कस ली है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लोगों के साथ ही हथियार कंपनियों को लुभाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की शस्त्र व्यापार संधि से अमेरिका के हटने के संकेत दे दिए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि संयुक्त राष्ट्र का यह समझौता भटकाने वाला है। यह बातें उन्होंने नेशनल राइफल एसोसिएशन (एनआरए) के एक कार्यक्रम में कहीं।ट्रंप का कहना है कि यह संधि अमेरिका के आंतरिक कानूनों में दखल देती है। इसके अलावा यह संधि सेकेंड अमेंडमेंड बिल में मिले अधिकारों का भी हनन करती है। बता दें कि अमेरिका में सेकेंड अमेंडमेंट बिल के तहत प्रत्येक नागरिक को हथियार रखने का अधिकार मिला हुआ है। आपको बता कि अमेरिका समेत लेटिन अमेरिका के लगभग सभी देश, यूरोपीय संघ, अफ्रीका के कई देश, पाकिस्तान, मिडिल ईस्ट के देश, मंगोलिया, जापान, आस्ट्रेलिया समेत कुछ अन्य देशों ने भी इस संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं। वहीं भारत, चीन और रूस, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

ये है वजह
ट्रंप ने राष्ट्रीय राइफल एसोसिएशन (एआरए) के वार्षिक सम्मेलन में इस संधि से बाहर होने की घोषणा की थी। इस संधि के तहत छोटे हथियारों, युद्धक टैंकों, लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों जैसे पारंपरिक हथियारों का अरबों डॉलर का वैश्विक व्यापार किया जाता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2013 में इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे। एनआरए लंबे समय से इसका विरोध कर रहा था, लेकिन अमेरिकी सांसदों ने इसका अनुमोदन नहीं किया था।अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने दोबारा चुने जाने के प्रयासों के लिए यह कदम उठाया है। उनकी इस घोषणा की कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने आलोचना की है।

क्या है संयुक्त राष्ट्र की शस्त्र व्यापार संधि
संयुक्त राष्ट्र की शस्त्र व्यापार संधि 24 दिसंबर 2014 को लागू की गई थी। इस संधि की 101 देशों ने पुष्टि कर रखी है और 34 देशों ने केवल हस्ताक्षर किए हुए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य हथियारों के गलत इस्तेमाल पर रोक लगाना है। संधि का काम देशों के बीच होने वाले हथियारों के आयात और निर्यात पर निगरानी रखना और उनके लिए नियम बनाना होता है। इस संधि के तहत राइफल, बंदूकों पर मुख्य ध्यान दिया गया है। इसमें शामिल देशों को संयुक्त राष्ट्र को यह रिकॉर्ड देना होता है कि उनके देश में कितने लोगों के पास कितने हथियार हैं। अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं। हस्ताक्षर करने का मतलब संधि के नियमों को मानना नहीं होता यह तभी होता है जब आप उसकी पुष्टि कर दें।  इसका मतलब उस संधि में अपनी रुचि दिखाना होता है। इसके बाद कैबिनेट से अप्रूवल लेकर पुष्टि की जाती है।

इस संधि पर भारत का क्या रहा है कदम
भारत ने संयुक्त राष्ट्र की शस्त्र व्यापार संधि में हस्ताक्षर नहीं किए थे। बता दें कि भारत भारी मात्र में हथियारों का आयात करता है। भारत के साथ ही रूस, चीन, ईरान, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे कई देशों ने भी इस संधि में हस्ताक्षर नहीं किए थे। भारत ने यह कहते हुए संधि का समर्थन करने से इंकार कर दिया कि यह शस्त्र निर्यातक देशों के हित में आयातक देशों के ऊपर थोपा गया कानून है जिसे मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। इसके अलावा यह परंपरागत हथियारों के अवैध व्यापार एवं इनके दुरुपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने में भी असमर्थ प्रतीत होती है।

एक नजर इधर भी
आपको बता दें कि दुनिया भर में होने वाले हथियारों के गैर-कानूनी व्यापार और तस्करी से उत्पन्न खतरे के मद्देनजर वर्ष 2003 में नोबेल शांति पुरस्कार विजेताओं के एक समूह ने संयुक्त राष्ट्र संघ से एक विनियंत्रण प्रणाली गठित करने की मांग की थी। उनके ही प्रयास स्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2006 में प्रस्ताव सं. 61/89 द्वारा एक शस्त्र व्यापार संधि स्थापित करने का निर्णय लिया गया। जब इस संधि प्रस्ताव को अपनाने के लिए 2 अप्रैल, 2013 को संयुक्त महासभा में मतदान हुआ था तब 154 सदस्य देशों ने इसके पक्ष में और 3 देशों-ईरान, सीरिया व उत्तर कोरिया ने इसके विरोध में मतदान किया था जबकि भारत सहित 23 देशों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया था।

(Adapted from Jagran.com)